17 दिसंबर 2019 - 18:39
क्या सऊदी अरब ईरान के डर से इस्राईली बंदरगाह से अपना तेल बेच रहा है? क्या सऊदी अरब और इस्राईल ईरान के खिलाफ युद्ध करेंगे?  एक चौ

अलखलीजुल जदीद ने लिखा है कि सऊदी अरब और इस्राईल के बीच निकटता की खबरें आ रही थीं क्योंकि इन दोनों को यह लगता था कि ईरान के सामने ओबामा की " कमज़ोरी" उनके लिए चिंता का कारण है

     यही वजह है कि यह दोनों ही ईरान के साथ परमाणु समझौते के विरोधी थे और दोनों ही का विचार था कि ईरान के खिलाफ कड़े क़दम उठाने चाहिए। इन सब के बावजूद इस्राईल ईरान व सऊदी अरब के झगड़े में सीधे रूप से शामिल नहीं होना चाहता उसकी वजह भी साफ है, इस्राईल को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर उसने सऊदी अरब और ईरान के विवाद में हिस्सा लिया तो उसे इस विवाद से कुछ फायदा मिलने की संभावना बहुत कम है लेकिन नुक़सान होने की आशंका बहुत ज़्यादा है।

     फ्रांक मेज़मार ने अपने एक लेख में लिखा है कि " फार्स की खाड़ी की सरकारें जो सऊदी अरब की घटक हैं, यह चाहती हैं कि वाशिंग्टन इलाक़े पर ज़रा अधिक ध्यान दे लेकिन यह बहुत मुश्किल काम है क्योंकि अमरीकी, लंबी लड़ाईयों में सैन्य सहयोग से थक चुके हैं। दूसरी बात यह है कि अब अमरीका को फार्स की खाड़ी के तेल की भी ज़रूरत नहीं है और ट्रम्प ने तो कई बार बल दिया है कि जिन लोगों को फार्स की खाड़ी के तेल के व्यापार से फायदा मिल रहा है, वही इस क्षेत्र की सुरक्षा का खर्चा भी उठाएं।

     इन सब के अलावा रियाज़ के सामने सब से बड़ी चुनौती, उसके नेताओं की खराब  होती छवि है। बिन सलमान, सऊदी पत्रकार खाशुकजी की हत्या के मामले में पूरी दुनिया में बदनाम हो चुके हैं और यमन के युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में सऊदी अरब की कड़ी आलोचना हो रही है। इन हालात में सऊदी अरब के पास एक कार्ड, इस्राईल के प्रति लचकदार रवैया है जिसके सहारे वह वाशिंग्टन में अपनी पोज़ीशन मज़बूत कर सकता है।

     सऊदी अरब ईरान से टकराव की वजह से काफी नुक़सान उठा रहा है, आरामको पर ईरान के घटक हौसियों के ड्रोन हमले से उसका तेल उत्पादन आधा हो गया। इस हमले से यह स्पष्ट हो गया कि सऊदी अरब ईरान और उसके घटकों के सामने कितना कमज़ोर है और भविष्य में इस प्रकार के हमले किस तरह से सऊदी अरब को तबाह कर सकते हैं क्योंकि तेल, सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था का आधार है।

     इन हालात में सऊदी अरब को तेल निर्यात के लिए नये रास्तों की तलाश है, यह इस्राईल की ओर उसके झुकाव की एक अन्य वजह है। कहा जा रहा है कि सऊदी अरब, प्रकृतिक गैस के आयात के लिए ईलात से एक पाइप लाइन बिछाए जाने पर इस्राईल के साथ वार्ता कर रहा है।

     अगर यह पाइप बिछ गयी तो फिर सऊदी अरब के तेल को पाइन लाइन द्वारा इस्राईल की हैफा बंदरगाह पहुंचाना आसान हो जाएगा और इस तरह से सऊदी अरब अपना तेल  युरोप और पश्चिमी देशों को बेच सकेगा और वह  हुरमुज़ स्ट्रेट और बाबुल मंदब स्ट्रेट से तेल भेजने से बच जाएगा जहां उसे हमेशा ईरान का डर लगा रहता है।

     उधर इस्राईल के पास अपनी  पाइप लाइन फैलाने की क्षमता नहीं है इस लिए अगर सऊदी अरब का उसे सहयोग मिल जाता है तो इससे उसके लिए यह पाइप लाइन भूमध्य सागर तक फैलाना संभव हो जाएगा।

     ओकलाहामा यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व अध्ययन केन्द्र के प्रमुख जोशदा लैंडिस का कहना है कि सऊदी अरब किसी भी दशा में ईरान के साथ युद्ध नहीं करेगा क्योंकि उसे मालूम है कि इससे उसकी तबाही होगी, जबकि ईरान , इराक़ के मार्ग से सीरिया से ज़मीनी संपर्क बनाने की कोशिश में है और इस रास्ते से वह गोलान और लेबनान के साथ मिलने वाली इस्राईली सीमा तक ज़मीनी रास्ते से पहुंच जाएगा, इस इलाक़े को शिया क्रिसेंट कहा जाता है।(Q.A.)